छतरपुर। श्रीमद् भागवत पुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पहले दिन मैहर के भागवत उपासक संत डॉ प्रभुजी गौतम ने कहा कि कथा सुनने वाले श्रोता अर्थात पात्र की पवित्रता भी उतनी ही जरूरी है जितना कि वक्ता में प्रभु से प्रेम, लंका में हनुमान जी महाराज तीन पात्रों को राम कथा सुनाते हैं। विभीषण जी राम कथा सुनने के बाद हनुमान जी को भक्ति स्वरूपा सीता जी को पाने की जुगति बता देते हैं, अशोक वाटिका में मां सीता राम कथा सुनने के बाद हनुमान जी को अजर अमर गुननिधि होने के साथ-साथ भगवान श्री राम के अत्यंत प्रिय पुत्र होने का वरदान देती है। हनुमान जी रावण को भी राम कथा सुनाते हैं पर अपात्र होने के कारण वह उन्हें अपमानित कर उनकी पूछ में आग लगवाता है, इसलिए आवश्यक है कि मन को माँझकर, मन को शुद्ध कर, निर्मल मन के साथ भागवत कथा में बैठे अन्यथा यह कथा श्रोता के मन में नहीं बैठेगी और कथा में बैठना व्यर्थ हो जाएगा।
क्षेत्रीय असाटी समाज गोंदिया के अध्यक्ष एवं उद्योगपति दिलीप असाटी द्वारा जय अंबे राइस मिल तिरोड़ा में श्रीमद् भागवत पुराण का आयोजन कराया गया है। डॉ प्रभुजी ने भागवत पुराण की पृष्ठभूमि का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास को 17 पुराण लिखने के बाद भी संतुष्टि नहीं मिली, तब नारद जी ने उन्हें समझाया कि अभी तक आपने मानव कल्याण के सूत्र दिए हैं पर प्रभु के चरणों में पवित्र प्रेम का ग्रंथ नहीं लिखा, तब देवर्षि नारद से चार श्लोक सुनकर वेदव्यास ने समास शैली से उनका 18 हजार श्लोक में विस्तार किया। डॉ प्रभु जी ने कहा कि अच्छा वक्ता होने के लिए पहले अच्छा श्रोता बनना होगा, तभी तो वेदव्यास जी चार श्लोक का इतना अधिक विस्तार कर पाए। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत के पहले वक्ता तो भगवान विष्णु ही हैं, उसके बाद अमरनाथ की पवित्र गुफा में अखंड श्रद्धा रूपी पार्वती को दृढ़ विश्वास रूपी शंकर ने भागवत कथा सुनाई। पूर्वार्ध की कथा पार्वती जी से और उत्तरार्ध की कथा शंकर जी से सुनकर शुकशावक तोता का बच्चा अमर हो गया और वही वेदव्यास के पुत्र शुकदेव बनकर राजा परीक्षित को यह कथा सुनाते हैं, शुकदेव 12 वर्ष तक अपनी मां के गर्भ में रहे वह गर्भ से बाहर नहीं आना चाहते थे क्योंकि वह प्रभु और अपनों की माया से भयभीत थे। डॉ प्रभु जी गौतम ने कहा कि माया का सरल सा अर्थ है कि जो है नहीं, पर लगता है। वेदव्यास के अत्यंत आग्रह पर वह इस स्वीकृति के साथ गर्भ के बाहर आए कि वह सीधे वन को प्रस्थान कर जाएंगे। वन को प्रस्थान करते शुकदेव के साथ पिता महर्षि वेदव्यास का प्रेम और इस दौरान वन के वृक्षों से हुए संवाद की तात्विक विवेचना करते हुए डॉ प्रभु जी ने कहा कि वृक्षों ने पुत्र मोह में अधीर महर्षि वेदव्यास से कहा कि हम जड़ होने पर भी पुत्र रूपी अपने फलों से मोह नहीं रखते उनका उपयोग दूसरे ही करते हैं।
नैमिषारण्य में कथा की प्रासंगिकता और महत्ता की विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि जहां इंद्रिय रूपी चंचल घोड़े रुक जाए, भगवान विष्णु का छोड़ा गया चक्र जहां शिथिल हुआ वही जगह नैमिषारण्य है जहां ज्ञान और भक्ति की बात हो सकती है। डॉ प्रभु जी ने कहा कि तन को शुद्ध करने के साधन बहुत है पर मन को शुद्ध करने का साधन श्रीमद् भागवत पुराण है, वृंदावन के यमुना किनारे पहुंचकर भक्ति भले पुष्ट हो गई पर ज्ञान और वैराग्य को मरणासन्न देखकर चिंतित नारद जी ने जोशीमठ पहुंचकर सनकादी ऋषियों से इसका उपाय पूछा, तब चारों ऋषियों ने अभिमान रूपी पहाड़ से उतरकर उन्हें गंगा तट पर हरिद्वार में भागवत पुराण की कथा सुनाई। सनकादी ऋषियों ने नारद जी को तीन उदाहरण के माध्यम से बताया कि वेदों से अधिक महत्वपूर्ण भागवत पुराण क्यों है, वेद वृक्ष हो सकते हैं पर रसास्वादन तो आम में ही मिलेगा, घी दूध से ही बनता है पर दीपक दूध में नहीं जल सकता, खीर के लिए शक्कर और गुड़ की जरूरत होगी, गन्ने की नहीं, उन्होंने कहा कि जीवन में जो भगवान के प्रति प्रेम पैदा कर दे वही कथा है बाकी सब व्यथा है।









