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श्रीमद् भागवत कथा श्रृंखला- 2साधक की प्रसन्नता में ही ईश्वर की प्रसन्नता है -श्री कौशिक जीनो

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छतरपुर। जिस किसी जीव मात्र ने भगवान को पहचान लिया, सृष्टि के रचयिता को जान लिया, उसने जब यह समझ लिया कि परमात्मा श्री कृष्ण ही तीनों कालों में भक्त पर कृपा करते है। वही वो परम तत्व है जिनकी दया दृष्टि से चर-अचर सभी प्राणी एवं प्रकृति स्थिर है, तब वह भक्त परमात्मा को समर्पित हो जाता है। ये उद्गार चेतगिर मंदिर मेें चल रही भागवत कथा में बुधवार को भगवती प्रसाद जी कौशिक ने प्रकट किए। उन्होंने कहा कि अनेक प्रकार के कर्म करता हुआ जीव विभिन्न योनियों में जन्म लेते हुए मनुष्य शरीर को प्राप्त करता है। इस जन्म में वह संत, गुरू की शरणागति होने पर अनुष्ठान में बैठता है तो भी वह अपार शांति का अनुभव करता है।मनु कर्दम संवाद का विशखेषण करते हुए श्री कौशिक जी ने कहा कि श्री कर्दम जी महाराज ने अपने पिता श्रीब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर वन में जाकर धर्मानुष्ठान प्रारंभ किया। जिससे उन्हें भगवान की कृपा के साथ-साथ परम शांति का अनुभव हुआ और उन्होंने साधना में हजारों वर्ष वहीं बिता दिए। साधना के कारण मन निर्मल तथा तन उज्जवल हो गया। मन से सभी प्रकार की लालसाएं समाप्त हो गईं। श्री कौशिक जी कहते है भले ही भक्त के मन में किसी प्रकार की कोई इच्छा न हो पर भगवान तो भक्त को सभी प्रकार का सुख प्रदान करते हैं। जैसे पिता अपने पुत्र की सभी इच्छाएं पूर्ण करता है ठीक उसी प्रकार भगवान भी अपने भक्त को सभी सुख देते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे मां हर दुख सहकर अपने बेटे को प्रसन्न देखना चाहती है वैसे ही ईश्वर भी अपने साधक को हमेशा प्रफुल्लित देखना चाहता है।श्री कौशिक जी ने कहा कि इस घोर कलयुग में भक्ति और साधना के द्वारा ही भगवान की प्राप्ति की जा सकती है। आप अपने समय का कुछ अंश भागवत कथा के श्रवण में लगाएं जिससे परमात्मा की निकटता हासिल हो सके। भागवत कथा के तीसरे दिन गुरुवार को गजेन्द्र मोक्ष, वामन अवतार और समुद्र मंथन की कथा होगी। आप सपरिवार आकर इस कथा का आनंद उठाएं।

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