
खजुराहो। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित आदिवर्त जनजातीय लोककला राज्य संग्रहालय में 23 मार्च को आयोजित किए गए देशज समारोह में खजुराहो को एक बार फिर सांस्कृतिक महाकुंभ बना दिया। इस समारोह ने न केवल बुंदेलखंड और बघेलखंड की अद्वितीय लोक परंपराओं को प्रकट किया, बल्कि आदिवासी नृत्य और संगीत के माध्यम से इनकी समृद्ध विरासत को सहेजने और प्रसार करने के लिए एक ऐतिहासिक पहल की।
समारोह की शुरुआत एक भव्य दीप प्रज्वलन और कलाकारों के स्वागत से हुई, जिसके बाद दर्शकों को भारतीय लोक कला के विविध रंगों और सुरों का अनूठा अनुभव हुआ। इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण था बुंदेली और बघेली लोकगीतों के साथ-साथ सैला, कर्मा जनजातीय नृत्य, जिनमें लोक जीवन, संस्कृति और श्रद्धा का अद्वितीय संगम था। इस अवसर पर, सुश्री रजनी आदिवासी और उनके साथी पन्ना ने बुंदेली लोकगीतों की प्रस्तुति से दर्शकों को अपनी पारंपरिक धुनों और काव्यात्मक भावनाओं में डुबो दिया। वही, सुश्री मनोभावना सिंह और साथी रीवा द्वारा बघेली लोकगीतों ने इस उत्सव में बघेलखंड की संगीत धारा को जीवित किया, जिससे लोक संगीत के प्रति सम्मान और प्रेम की एक नई लहर देखने को मिली। सुश्री रामबाई धुर्वे और उनके साथी डिंडोरी द्वारा प्रस्तुत सैला और करमा नृत्य न केवल कला का प्रदर्शन था, बल्कि यह आदिवासी समुदाय की जीवनशैली, उनके श्रम के प्रति सम्मान और संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रतीक भी था। करमा नृत्य में गोंड आदिवासी समुदाय के लोग श्रम और कर्मदेवता की पूजा करते हैं। यह नृत्य जीवन की कठिनाइयों और श्रमिक वर्ग के सम्मान की भावनाओं को व्यक्त करता है। युवक-युवतियां इस नृत्य में अपनी संस्कृति और प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा दर्शाते हैं। इसके गीतों में रोजमर्रा की जिंदगी, प्रेम, और संघर्ष का चित्रण किया जाता है। सैला नृत्य को विशेष रूप से शरद ऋतु की चाँदनी रातों में किया जाता है, और यह गोंड जनजाति के लिए अत्यधिक पवित्र होता है। इस नृत्य में डंडे की विशेष भूमिका है, जिसके कारण इसे ‘सैला’ कहा जाता है। यह नृत्य आदिदेव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है और इसकी उत्पत्ति एक दिलचस्प किंवदंती से जुड़ी हुई है, जिसमें आदिदेव बधेसुर के नाराज होने पर अमरकंटक गए थे और वहाँ के बांसों से इस नृत्य की शुरुआत हुई।
गौरतलब है कि खजुराहो अब केवल अपनी ऐतिहासिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोक कला, संस्कृति और परंपराओं का अद्वितीय केंद्र भी बन चुका है। देशज समारोह ने बुंदेलखंड, बघेलखंड और जनजातीय क्षेत्रों की कला और संस्कृति के प्रति सम्मान और सराहना बढ़ाई है। इस आयोजन ने न केवल कलाप्रेमियों के दिलों में जगह बनाई है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर भी स्थापित की है। ‘देशज’ समारोह ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय लोक कला और संस्कृति की जड़ें हमारे ग्राम्य जीवन, परंपराओं और विश्वासों में बसी हुई हैं। इस उत्सव ने खजुराहो को सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षक और प्रचारक बना दिया है, और इसके माध्यम से हम अपनी समृद्ध संस्कृति को पूरी दुनिया तक पहुँचाने का संकल्प ले सकते हैं।






