छतरपुर। पन्ना जिले में निर्माणाधीन ढोडन बांध का काम पिछले तीन दिनों से पूरी तरह बंद पड़ा है। स्थानीय विस्थापितों के विरोध के कारण सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारी निर्माण स्थल पर राशन लेकर डेरा डालकर बैठ गए हैं। विरोध इतना तीव्र है कि एसीसी कंपनी के ठेकेदारों के कर्मचारी वाहन और मशीनें वहीं छोड़कर भाग गए, जिससे कंपनी को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है।प्रदर्शनकारियों में ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। इनमें 90 प्रतिशत लोग मझगांव बांध एवं विश्रामगंज ढोडन बांध क्षेत्र के ढोडन, पलकोंहा, खरयानी, सुकवाहा, मैनारी सहित डूब क्षेत्र के 14 गांवों के निवासी हैं। दूर-दूर के गांवों से आए ये लोग बांध निर्माण का काम पूरी तरह रोकने के लिए अड़े हुए हैं।प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए। उनका कहना है कि पन्ना जिले में पहले बन चुके दो बांधों (मझगान्य बांध और विश्रामगंज बांध) के विस्थापितों को मात्र पांच लाख रुपये का पैकेज दिया गया, जबकि वे ढोडन बांध के विस्थापितों के लिए साढ़े बारह लाख रुपये का पैकेज मांग रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि बांध सरकार बना रही है, इसलिए सभी विस्थापितों को समान मुआवजा मिलना चाहिए।इतना ही नहीं, कुछ विस्थापित महिलाएं दिल्ली कूच कर प्रधानमंत्री कार्यालय का घेराव करने जा रही थीं, लेकिन खैरी टोल प्लाजा पर पुलिस ने उनके काफिले को रोक दिया। अब वे निर्माण स्थल पर ही डटे हुए हैं और कई दिनों का राशन लेकर आंदोलन चला रहे हैं।अभी तक केवल पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारी ही मौके पर पहुंचे हैं। ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव, फिल्ड डायरेक्टर, पन्ना टाइगर रिजर्व आज प्रदर्शनकारियों से बात करने पहुंचे। उन्होंने लोगों को समझाने की कोशिश की कि यह क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है, यहां जंगली जानवर विचरण करते हैं और कोई अप्रिय घटना हो सकती है। उन्होंने सलाह दी कि लोग अपनी मांगें वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष रखें। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने उनकी बात नहीं मानी और उन्हें उल्टे पैर लौटना पड़ा।अन्य विभागों के अधिकारी अभी तक मौके पर नहीं पहुंचे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पहले बन चुके बांधों में उन्हें कम मुआवजा दिया गया, जिस कारण अब वे ढोडन बांध का काम रोककर अपनी मांगें मनवाने पर अड़े हैं।वर्तमान में निर्माण स्थल पर वाहनों और मशीनों के चक्के जाम पड़े हैं। ठेकेदार कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों पर अब दबाव बढ़ गया है कि वे जल्द से जल्द विस्थापितों की मांगों पर विचार करें और निर्माण कार्य को सुचारू रूप से शुरू करवाएं।










