छतरपुर। शहर के जवाहर रोड स्थित मां खेरे की देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना है और छतरपुर शहर की चारों दिशाओं में स्थापित सिद्धपीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि नगर की रक्षा और जनकल्याण के लिए माता यहां विराजमान हुई थीं। यही कारण है कि चैत्र नवरात्रि के दौरान इस प्राचीन मंदिर में विशेष धार्मिक माहौल बना रहता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।इतिहास और लोकमान्यता के अनुसार मां खेरे की देवी की सिद्ध प्रतिमा की स्थापना लगभग 300 वर्ष पूर्व छतरपुर की स्थापना करने वाले महाराजा छत्रसाल ने अपने गुरु की प्रेरणा से कराई थी। मंदिर परिसर में मां खेरे की देवी के साथ काल भैरव, बटुक भैरव और सूर्य भगवान भी विराजमान हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां खेरे की कृपा से छतरपुर शहर सहित पूरा बुंदेलखंड अंचल अनेक प्रकार की आपदाओं से सुरक्षित रहता है।नवरात्रि के अवसर पर मां खेरे की देवी मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। भक्त विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर माता के दरबार में अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित करते हैं, जो लगातार नौ दिनों तक जलती रहती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना यहां पूर्ण होती है। महिलाएं, युवक-युवतियां और परिवारजन पारंपरिक वेशभूषा में मंदिर पहुंचकर सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।मंदिर की सबसे विशेष और आकर्षक परंपराओं में से एक माता के बदलते स्वरूप हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार प्रतिदिन माता को दिन में तीन अलग-अलग स्वरूपों में सजाया जाता है। इसी क्रम में तीन दिनों के भीतर माता के नौ स्वरूपों की झलक भक्तों को देखने को मिलती है। माता के इन दिव्य श्रृंगारों और मनोहारी स्वरूपों के दर्शन के लिए भी बड़ी संख्या में भक्त मंदिर पहुंचते हैं। हर स्वरूप में माता की अलग-अलग छवि श्रद्धालुओं के मन में भक्ति और श्रद्धा का भाव और गहरा कर देती है।मंदिर के पुजारी मुन्ना महाराज के अनुसार नवरात्रि में ज्योत जलाने और विशेष श्रृंगार की परंपरा वर्षों पुरानी है। श्रद्धालु पूरे विश्वास और भक्ति के साथ माता के समक्ष मनौती मांगते हैं। नौ दिनों तक चलने वाली पूजा, आरती, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से मंदिर परिसर पूरी तरह भक्तिमय बना रहता है।मां खेरे की देवी मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि बुंदेली संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थल है। छतरपुर में विवाह के बाद नवविवाहित जोड़े बुंदेली परंपरा के अनुसार हाथे लगाने के लिए मां खेरे की देवी और गांव की देवी मंदिर पहुंचते हैं और अपने दांपत्य जीवन की सुखद शुरुआत का आशीर्वाद लेते हैं। इसी तरह बच्चे के जन्म के बाद परिवारजन झूला-चंगेर लेकर गाजे-बाजे के साथ मंदिर पहुंचते हैं और माता के चरणों में नवजीवन का आशीर्वाद मांगते हैं।छतरपुर जिले में मां खेरे की देवी, गांव की देवी, हमां की काली देवी, फूला देवी, बगराजन और झनझन देवी जैसे मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। इन मंदिरों से जुड़ी लोकआस्था आज भी लोगों के जीवन, संस्कार और सामाजिक परंपराओं में गहराई से रची-बसी है।नवरात्रि के दिनों में मां खेरे की देवी मंदिर में उमडऩे वाली भीड़ यह बताती है कि आधुनिक समय में भी श्रद्धा, परंपरा और लोकविश्वास की जड़ें कितनी मजबूत हैं। मां के दरबार में पहुंचने वाला हर श्रद्धालु अपनी मनोकामना, विश्वास और भक्ति के साथ लौटता है, और यही इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी पहचान है।










