
तालाब में दिखा पूर्वांचल का नजारा, अघ्र्य देने के साथ पूर्ण हुआ छठ महापर्व
छतरपुर। पिछले चार दिनों से पूर्वांचल के लोग छठी माता की कृपा पाने एवं भगवान भास्कर का आशीर्वाद लेने के लिए कठिन व्रत कर रहे थे। चार दिवसीय छठ महोत्सव भगवान भास्कर के उदय होने और उन्हें अघ्र्य समर्पित करने के साथ ही पूरा हो गया। बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरूष सुबह साढ़े 4 बजे स्थानीय प्रताप सागर तालाब की चौपाटी क्षेत्र में आए जहां उन्होंने व्रत के क्रमानुसार दातून करते हुए स्नान किया और सूर्य भगवान के निकलने पर उन्हें अघ्र्य दिया। इसके साथ ही यह पर्व पूरा हुआ। व्रत साधना करने वाली महिलाओं ने घर जाकर गुड़ या चीनी का शरबत लेकर तारण किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में पूर्वांचल के लोग उपस्थित रहे। साथ ही स्थानीय लोगों ने भी छठ पर्व महा रहे लोगों का उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम में सबको प्रसाद ग्रहण करने का अवसर मिला।ऐसे मनाया जाता है चार दिन का पर्वचार दिवसीय छठ महोत्सव की शुरूआत नहाय खाय से होती है। बिहार के रहने वाले अम्बुज शर्मा ने बताया कि पहले दिन चने की दाल, चावल, लौकी सब्जी आदि देशी घी में तैयार किए जाते हैं। पवित्रता के भाव के साथ पीतल के बर्तन में भोजन पकाया जाता है। रात में लिट्टी बनाने का विधान है। दूसरे दिन खड़णा का आयोजन होता है, इसमें दिन भर कुछ नहीं खाया जाता, शाम को फल खाने का विधान है। संध्या के समय नए धान की खीर बनायी जाती है, धान को ऐसे स्थान में कूटा जाता है जो साफ-सुथरा और पवित्र हो, एक-एक दाना बीनकर तैयार किया जाता है। भोजन बनाकर यथासंभव लोगों को आमंत्रित किया जाता है। अगले दिन व्रत रखकर महिलाएं शाम को भगवान भास्कर के अस्त होने के समय अघ्र्य देती हैं। अघ्र्य में नारियल, सेव, ठेकुआ, पान, ड्राईफ्रूट्स, ईख, हल्दी आदि रखकर भगवान सूर्य का अघ्र्य दिया जाता है। इसी दिन ठेकुआ बनाया जाता है जो गेहंू का बनता है। शाम को अघ्र्य देने के बाद अगले दिन सुबह से सरोवर में पहुंचकर पूजा की जाती है और जैसे ही भगवान सूर्य नजर आते हैं वैसे ही उन्हें अघ्र्य देने का कार्य शुरू हो जाता है। इसी अघ्र्य देने के बाद यह चार दिवसीय पर्व पूर्ण होता है।









