छतरपुर। शहर की सड़कों और गलियों में आवारा मवेशी बेखौफ घूम रहे हैं। लोग रोजाना परेशान हैं, दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है, फिर भी नगर पालिका लाखों रुपये खर्च करके भी स्थिति नहीं सुधार पा रही। कागजों और फोटो में मवेशी पकडऩे का दावा किया जा रहा है, लेकिन हकीकत में शहर जस का तस आवारा पशुओं से भरा पड़ा है।
नगर पालिका ने मवेशियों को हटाने के लिए दस लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति ली थी। पत्र में साफ लिखा गया था कि शहर में विचरण कर रहे मवेशियों को गौशाला भेज दिया जाए। लेकिन आवारा मवेशी अभी भी सड़कों पर बैठे और घूमते दिख रहे हैं। इस बीच लाखों रुपये के बिल बनकर ऑडिट शाखा तक पहुंच चुके हैं। नगर पालिका का दावा है कि कुछ दिनों में तीन सौ आवारा मवेशियों को सरानी, राधेपुर और नंदीग्राम गौशाला में भेज दिया गया है। साथ ही पच्चीस सौ मवेशियों को हांककर शहर के बाहर निकाल दिया गया है। लेकिन आम लोगों का सवाल साफ है जब इतनी बड़ी संख्या में मवेशी शहर से बाहर भेज दिए गए, तो सड़कों और गलियों में हजारों मवेशी फिर कहां से आ गए?
राहगीर अनिल बताते हैं कि मवेशी सड़क पर बैठे रहते हैं तो रोजाना दिक्कत झेलनी पड़ती है। हाल ही में आवारा जानवर आपस में लड़ रहे थे तो उनकी बाइक गिर गई और उन्हें चोट भी आई। बृजेश तिवारी का कहना है कि सड़कों पर मवेशियों के बैठे रहने से लगातार परेशानी हो रही है। नगर पालिका के कर्मचारी आते हैं, एक-दो मवेशी उठाकर फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। राजेन्द्र सोनी बताते हैं कि बीच सड़क पर मवेशियों के बैठने से दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। नगर पालिका सिर्फ कागजों में मवेशी शहर से बाहर करवा रही है। उनका आरोप है कि कर्मचारी जीवित मवेशियों को तो छोडि़ए, मृत गायों को भी मुश्किल से उठाते हैं।
शहरवासियों का साफ मानना है कि मवेशी हटाने के नाम पर नगर पालिका ने लाखों रुपये का खेल कर दिया है। कागजी कार्रवाई और फोटो के सहारे काम दिखाया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। सड़कों पर आवारा मवेशी पहले की तरह बैठे हैं और आम आदमी रोजाना मुश्किलें झेल रहा है।









