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राजनगर के मजदूर का बेटा खेलेगा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट

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छतरपुर। बुंदेलखंड की तपती धरती और अभावों के बीच पले-बढ़े एक युवा ने अपनी शारीरिक अक्षमता को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। राजनगर विधानसभा क्षेत्र के छोटे से ग्राम तालगांव के निवासी शहीद उर्फ साहिल खान का चयन श्रीलंका दौरे के लिए राष्ट्रीय दिव्यांग क्रिकेट टीम में होना, केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है, बल्कि यह उस अटूट हौसले की जीत है जो गरीबी और दिव्यांगता की बेडिय़ों को तोड़कर आसमान छूने का माद्दा रखता है। इस खबर के सामने आते ही पूरे छतरपुर जिले और मुस्लिम समाज सहित सभी वर्गों में हर्ष का माहौल है।साहिल खान की इस स्वर्णिम सफलता के पीछे संघर्ष की एक ऐसी दास्तान छिपी है, जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर दे। साहिल की माता ने भावुक होकर बताया कि उनका बेटा बचपन में अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए गांव-गांव जाकर बर्फ बेचा करता था। बेटे के सपनों को पंख देने के लिए मां ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी; उन्होंने दिल्ली के निर्माण स्थलों पर मजदूरी की, सिर पर ईंट और तसले उठाए, ताकि उनका बेटा क्रिकेट के मैदान पर अपनी प्रतिभा निखार सके। आज जब साहिल का चयन टीम इंडिया (दिव्यांग) में हुआ है, तो मां की आंखों से छलके खुशी के आंसू उन वर्षों की कठोर तपस्या का फल बयां कर रहे हैं।लगन और मेहनत से रोशन किया बुंदेलखंड का नामसाहिल के करीबी मित्रों और ग्रामीणों का कहना है कि वे बचपन से ही बेहद मेहनती और खेल के प्रति समर्पित रहे हैं। विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया, बल्कि उनके इरादों को और फौलादी बनाया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की खेल प्रोत्साहन नीतियों और ग्रामीण प्रतिभाओं को मंच देने के विजन के बीच, साहिल की यह उपलब्धि राजनगर क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गई है। लोगों को गर्व है कि उनके गांव का बेटा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रीलंका की जमीन पर भारत का प्रतिनिधित्व करेगा।गांव में जश्न का माहौल और शुभचिंतकों का तांतासाहिल की इस ऐतिहासिक कामयाबी पर बधाई देने वालों का उनके घर पर तांता लगा हुआ है। तालगांव सरपंच मनोज पटेल, अवध पटेल, हरियाणा पटेल और मोहम्मद इमरान (ललपुर) ने साहिल के निवास पहुंचकर परिजनों को मिठाई खिलाई और साहिल के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। ग्रामीणों ने उम्मीद जताई है कि साहिल श्रीलंका दौरे पर अपने बल्ले और गेंद से शानदार प्रदर्शन कर न केवल भारत को जीत दिलाएंगे, बल्कि तिरंगे का मान पूरी दुनिया में बढ़ाएंगे। यह सफलता छतरपुर के हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखता है।

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