Home डेली न्यूज़ चौथे जनकवि रामजीलाल चतुर्वेदी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित हुए सत्यम श्रीवास्तव

चौथे जनकवि रामजीलाल चतुर्वेदी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित हुए सत्यम श्रीवास्तव

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छतरपुर। स्थानीय गांधी आश्रम में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद एवं गोस्वामी तुलसीदास की जयंती के अवसर पर स्मृति प्रेमचंद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराजा छत्रसाल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष पुष्पा दुबे ने की। कार्यक्रम में सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा मुंशी प्रेमचंद, गोस्वामी तुलसीदास एवं जनकवि रामजीलाल चतुर्वेदी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। स्वागत वक्तव्य इकाई की सचिव निदा रहमान ने दिया। तत्पश्चात लखन अहिरवार एवं साथियों ने राजेश जोशी की कविता एवं कबीर का गीत प्रस्तुत किया। देश भर में ख्यात रहे शहर के साहित्यकार रामजीलाल चतुर्वेदी ‘नन्नाÓ की स्मृति में नवोदित साहित्यकार की प्रथम कृति को दिया जाने वाला चौथा जनकवि रामजीलाल चतुर्वेदी स्मृति सम्मान स्मृतियाँ जब हिसाब माँगेंगी पुस्तक के लिए सत्यम श्रीवास्तव को प्रदान किया गया। यह कथेतर किताब कोरोना की विभीषिका के दौरान लिखे गए चुनिंदा लेखों का संकलन है, जो उस दौर में देश में जन-जीवन के तमाम पहलुओं पर हुए प्रभावों और सरोकारों पर केंद्रित है। इस आयोजन के मुख्य अतिथि सत्यम सत्येंद्र पाण्डेय ने किताब पर एक विवेचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की।
सत्यम सत्येंद्र पाण्डेय ने इस किताब और उसके विभिन्न संदर्भों पर विस्तृत टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक प्रगतिशील लेखन वह होता है, जो अपने समय के मौजूदा सवालों को कितनी ईमानदारी और साफगोई से बयान करता है और यही लेखन आगे जाकर कालजयी होता है। प्रासंगिकता लेखन की कम और उन परिस्थितियों की ज्यादा होती है, जो हम बदल नहीं पाते। आज मुंशी प्रेमचंद इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि आज भी वैसी ही परिस्थितियाँ बनी हुई हैं। अगर उन्होंने दहेज, छुआछूत या किसानों की दुर्दशा के बारे में लिखा और ठीक वही परिस्थितियाँ आज इक्कीसवीं सदी में भी बनी हुई हैं, तो इसका आशय यह है कि हमने एक समाज के तौर पर और एक आजाद देश के तौर पर उन परिस्थितियों को नहीं बदला और इसलिए प्रेमचंद प्रासंगिक हैं। हालांकि उन्होंने अपने समय के मौजूदा सवालों के बारे में लिखा। सत्यम ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह किताब भी तब तक प्रासंगिक रहेगी, जब तक ये परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं, क्योंकि इस किताब ने अपने समय के सवालों से ईमानदारी से सामना किया है, उन्हें दर्ज किया है।
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. बहादुर सिंह परमार ने रामजीलाल चतुर्वेदी के महत्वपूर्ण गीतों को रेखांकित करते हुए अपनी बात कही, साथ ही मुंशी प्रेमचंद एवं गोस्वामी तुलसीदास के माध्यम से वर्तमान लेखकों को अपने समय से मुठभेड़ करते हुए ईमानदारी से लेखन करने के लिए प्रेरित किया। पुरस्कृत लेखक सत्यम श्रीवास्तव ने इसे सभागार में बैठे सभी लोगों का सम्मान बताया और कहा कि अपने ही शहर में ‘नन्नाÓ की स्मृति में सम्मान ग्रहण करना, किसी भी सम्मान से बड़ा है। सत्यम ने कहा कि उन्हें इस शहर ने गढ़ा है और अपने समय के सवालों से जूझना सिखाया है। सत्यम ने कोरोना की विभीषिका को याद करते हुए इस किताब को अपनी नागरिक जिम्मेदारी बताया। कोरोना के दौरान और उसके बाद देश और समाज ने क्या खोया और हम कितने पीछे गए, इसका एक फौरी आकलन किया और जीवन के हर क्षेत्र, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक विषमता के मुद्दों पर बात की। कोरोना के दौरान सरकारें, प्रशासन और मीडिया की भूमिका पर भी बात करते हुए अपनी किताब के संदर्भ स्पष्ट किए। सत्यम ने इस बात पर जोर दिया कि शताब्दियों में आने वाली इस तरह की महामारियों को इसलिए याद रखने की जरूरत है, ताकि हम एक समाज, एक राज्य और एक देश के तौर पर ऐसी परिस्थितियों को लेकर खुद को तैयार कर सकें। उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी साहित्य सम्मेलन, इप्टा और शंखनाद नाट्य मंच का आभार व्यक्त किया, जिनके संयुक्त तत्वावधान में यह आयोजन हुआ।
व्याख्यान की श्रृंखला में डॉ. पुष्पा दुबे, कवि एवं कथाकार आभा श्रीवास्तव, कथाकार अमिता अरजरिया ने प्रभावी हस्तक्षेप किया। शोधार्थी सत्यम यादव ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित कविता सुनाई। अनुष्का श्रीवास्तव ने निदा फाजली की गजल की संगीतमयी प्रस्तुति दी। कवियित्री संतोष पटेरिया, कवि डॉ. सुरेंद्र सिंह ‘अंजलिÓ ने गोस्वामी तुलसीदास से संबंधित रचनाएँ सुनाईं। कार्यक्रम का सफल संचालन इकाई अध्यक्ष नीरज खरे ने किया। वरिष्ठ रंगकर्मी शिवेंद्र शुक्ला ने नन्ना से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर गांधी स्मारक निधि की सचिव दमयंती पाणि, प्रोफेसर सुमति प्रकाश जैन, राजेश श्रीवास्तव, स्नेहलता, श्याम गौतम, अजय सिंह, उपेंद्र सिंह, शोभा शर्मा, स्मिता जैन, शंकर लाल सोनी, अवनींद्र खरे ‘अंशुमानÓ, अभिदीप सुहाने, प्रांजल पटेरिया, निशांत बाल्मीकि, प्रद्युम्न, विकास मिश्रा सहित शहर के साहित्य प्रेमी, शोधार्थी एवं छात्र उपस्थित रहे।

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